मिलकर तुमसे ये सोचा
तुम्हारी रुह के बन्धन मेँ होने का,
मिलकर तुमसे ये सोचा
तुम्हारी साँस के माले पिरोने का..
मैँ एक नन्हाँ सा लम्हा हूँ, जो तेरे पल मेँ
जिन्दा हूँ,
मिलकर तुमसे ये सोचा
इसी लम्हे को जीवन भर सँजोने का..
मैँ जिन्दा हूँ तो जिन्दा हूँ तुम्हारी इक हँसी खातिर..
है थोड़ा मन..इसी ख्वाहिश मेँ सारी उम्र खोने का..
मुझे अच्छे नहीँ लगते तुम्हारी आँख मेँ आँसू..
मिलकर तुमसे ये सोचा
मेरी आँखो मे तेरा अश्क ढोने का..
खुले जो नीँद मेरी, हर सुबह बस तू दिखाई दे..
मिलकर तुमसे ये सोचा
इसी उम्मीद मेँ हर रात सोने का..
मरुँ मैँ तो, तुम्हारी गोद मेँ सिर रख के
मर जाऊँ..
मिलकर तुमसे ये सोचा
इसी जन्नत मेँ मेरा अन्त होने का...
“गौरव दुबे ”

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