Monday, 1 September 2014

तुम देना साथ मेरा

कुछ क्षण आते हैं ज़िंदगी में जब लगता है कि इससे बुरा और कुछ नहीं हो सकता। कुछ समय बाद कुछ उससे भी बुरा दिखता है तो लगता है पहले हम कितने गलत थे। जो हुआ वह इतना भी गलत नहीं था। जितना था वह झेला जा सकता था। काश! सबकी ज़िंदगी में कुछ ऐसे रिश्ते होते जो उस बुरे क्षण के बीत जाने तक हमारा साथ देते। ऐसा होता तो लोग बेघर न होते, आत्महत्या न करते। आज सब अपने में इतने मस्त हैं कि उन्हें लगता ही नहीं कि उन्हें भी किसी की ज़रूरत पड़ सकती है। स्वार्थ में इंसान को दूसरा दिखाई ही नहीं देता। ऐसे ही लोग आत्महत्या करने के कगार पर पहुँच जाते हैं।
लोगों के साथ उनके दुख के क्षणों में खड़े हों, ताकि आपके दुख में लोग आपके साथ आयें। साथ का मतलब कुछ करना ही नहीं होता। कई बार केवल बातों से या केवल साथ खड़े होकर ही आप किसी को जीवन दे सकते हैं।

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