अपने हृदय से लगाकर सुला देती थी माँ पीठ थपथपाकर
मेरी आखे बंद हो जाती पर नादान मै जगता रहता सोकर
आखे बंद वो आई, आते आते मुझे गुदगुदी लगाई
बहुत गन्दी थी वो, ना जागता तो करती थी पिटाई
मजबूरी में आखे खोलू ओ कहती मुझे गोलू मोलू
साथ खेलने को थी अड़ी, वो रखती थी जादू की छड़ी
अपने हृदय से लगाकर सुला देती थी माँ पीठ थपथपाकर
मेरी आखे बंद हो जाती पर नादान मै जगता रहता सोकर
स्वर्ग का सैर कराती ह्वावो में उड़ाती नदियों में तैराती
थक के चूर होता खेलखेल कर, तब भुखु मुझको आती
जादू की छड़ी से मिठाइयाँ लाकर प्यार से मुझे खिलाती
जाती जब चूम कर मुझको सच में आखो को बहुत रुलाती
अपने हृदय से लगाकर सुला देती थी माँ पीठ थपथपाकर
मेरी आखे बंद हो जाती पर नादान मै जगता रहता सोकर
बंद आखो में सिर्फ ओ होती थी आखे खोलो तो सब होते साथ
मुझे सब कहते ओ सपना थी अब बड़ा हुआ तो वो छोड़ गयी
अकेले अक पल नही गुजरथा था उसका पकड़ क चलती मेरा हाथ
सज़ा दि या गैरो से की सपनों का सौदा और दिल मेरा तोड़ गयी
जो महज सिर्फ सपना था जो होना न कभी अपना था
बरसो से आस थी कब दीदार हो उस वक्त की तलाश थी
अपने हृदय से लगाकर सुला देती थी माँ पीठ थपथपाकर
मेरी आखे बंद हो जाती पर नादान मै जगता रहता सोकर
समय बदला समझ आई, दिल पर गम की काल्ली बदलिया
छाई
धुढ रहा उस सपनो की परी को मेरी निगाहे तेरी आखो से टकराई
अचम्भित हुआ देखर पर वो काजल वाली आखों से पहचाना
चुपके से सिराहने बैठकर देखता रहा तुझे बनके अनजाना
वो प्यारी बचपन की आखें आज प्यार का समुन्द्र बना है
ऐसे तिरछी निगाहों से डराकर कह रही हसे छूना मना है
इनके रेशम सी बालो का दीवाना था मेरा बचपन भी
कानो में मोतियों पहनी बैठकर कोने में खीच रही सेल्फी
लिवास और होठो का रंग एकदूजे से कर रहा मिलन
मद की नशे में लग रही थी आखें जो देखे हो जाए शराबी
वस्त्र गुलाब के रंग का उपर से मदिरामयी उनके होठ गुलाबी
सोचा आज बया करूंगा परी से अपनी पुरानी जज्बात
ये क्या हुआ फिर आखें खुली देखा तो बाकी थी रात
ओ भी सपना और ये भी सपना
सायद कोई नही किस्मत में अपना
सच्चे थे वो दिन जब
अपने हृदय से लगाकर सुला देती थी माँ पीठ थपथपाकर
मेरी आखे बंद हो जाती पर नादान मै जगता रहता सोकर
"गौरव दुबे "



