Friday, 10 October 2014

परी मेरे सपनों की



अपने हृदय से लगाकर सुला देती थी माँ पीठ थपथपाकर
मेरी आखे बंद हो जाती पर नादान मै जगता रहता सोकर

आखे बंद वो आई, आते आते मुझे गुदगुदी लगाई
बहुत गन्दी थी वो, ना जागता तो करती थी पिटाई
मजबूरी में आखे खोलू ओ कहती मुझे गोलू मोलू
साथ खेलने को थी अड़ी, वो रखती थी जादू की छड़ी

अपने हृदय से लगाकर सुला देती थी माँ पीठ थपथपाकर
मेरी आखे बंद हो जाती पर नादान मै जगता रहता सोकर

स्वर्ग का सैर कराती ह्वावो में उड़ाती नदियों में तैराती
थक के चूर होता खेलखेल कर, तब भुखु मुझको आती
जादू की छड़ी से मिठाइयाँ लाकर प्यार से मुझे खिलाती
जाती जब चूम कर मुझको सच में आखो को बहुत रुलाती

अपने हृदय से लगाकर सुला देती थी माँ पीठ थपथपाकर
मेरी आखे बंद हो जाती पर नादान मै जगता रहता सोकर

बंद आखो में सिर्फ ओ होती थी आखे खोलो तो सब होते साथ
मुझे सब कहते ओ सपना थी अब बड़ा हुआ तो वो छोड़ गयी
अकेले अक पल नही गुजरथा था उसका पकड़ क चलती मेरा हाथ
सज़ा दि या गैरो से की सपनों का सौदा और दिल मेरा तोड़ गयी

जो महज सिर्फ सपना था जो होना न कभी अपना था
बरसो से आस थी कब दीदार हो उस वक्त की तलाश थी

अपने हृदय से लगाकर सुला देती थी माँ पीठ थपथपाकर
मेरी आखे बंद हो जाती पर नादान मै जगता रहता सोकर

समय बदला समझ आई, दिल पर गम की काल्ली बदलिया छाई
धुढ रहा उस सपनो की परी को मेरी निगाहे तेरी आखो से टकराई

अचम्भित हुआ देखर पर वो काजल वाली आखों से पहचाना
चुपके से सिराहने बैठकर देखता रहा तुझे बनके अनजाना
वो प्यारी बचपन की आखें आज प्यार का समुन्द्र बना है
ऐसे तिरछी निगाहों से डराकर कह रही हसे छूना मना है

इनके रेशम सी बालो का दीवाना था मेरा बचपन भी
कानो में मोतियों पहनी बैठकर कोने में खीच रही सेल्फी
लिवास और होठो का रंग एकदूजे से कर रहा मिलन

मद की नशे में लग रही थी आखें जो देखे हो जाए शराबी
वस्त्र गुलाब के रंग का उपर से मदिरामयी उनके होठ गुलाबी
सोचा आज बया करूंगा परी से अपनी पुरानी जज्बात
ये क्या हुआ फिर आखें खुली देखा तो बाकी थी रात
ओ भी सपना और ये भी सपना
सायद कोई नही किस्मत में अपना
सच्चे थे वो दिन जब
अपने हृदय से लगाकर सुला देती थी माँ पीठ थपथपाकर
मेरी आखे बंद हो जाती पर नादान मै जगता रहता सोकर

 "गौरव दुबे "

Sunday, 14 September 2014

मिलकर तुमसे ये सोचा


मिलकर तुमसे ये सोचा
तुम्हारी रुह के बन्धन मेँ होने का,
मिलकर तुमसे ये सोचा
तुम्हारी साँस के माले पिरोने का..
मैँ एक नन्हाँ सा लम्हा हूँ, जो तेरे पल मेँ जिन्दा हूँ,
मिलकर तुमसे ये सोचा
इसी लम्हे को जीवन भर सँजोने का..
मैँ जिन्दा हूँ तो जिन्दा हूँ तुम्हारी इक हँसी खातिर..
है थोड़ा मन..इसी ख्वाहिश मेँ सारी उम्र खोने का..
मुझे अच्छे नहीँ लगते तुम्हारी आँख मेँ आँसू..
मिलकर तुमसे ये सोचा
मेरी आँखो मे तेरा अश्क ढोने का..
खुले जो नीँद मेरी, हर सुबह बस तू दिखाई दे..
मिलकर तुमसे ये सोचा
इसी उम्मीद मेँ हर रात सोने का..
मरुँ मैँ तो, तुम्हारी गोद मेँ सिर रख के मर जाऊँ..
मिलकर तुमसे ये सोचा
इसी जन्नत मेँ मेरा अन्त होने का...


“गौरव दुबे ”

Tuesday, 9 September 2014

खता हो गयी मुझसे - "गौरव दुबे "






















खता  हो गयी मुझसे की जो तुजसे नज़रे न मिला पाए ,
बेवफा हमें क्या पता था तुम यूँ रुसवा होके निकलोगे !

खता  हो गयी मुझसे की जो तुझपे विस्वास कर गए ,
बेवफा हमें क्या पता था तुम्ही दगा दिल से  करोगे !


खता  हो गयी मुझसे की जो तुमको अपना दिल सुपुर्द किया ,
बेवफा हमें क्या पता था तुम्ही बेवफा सनम निकलोगे !


खता  हो गयी मुझसे की जो तुम्हारा यूँ  रस्ता तकते रहे ,
बेवफा हमें क्या पता था तुम्ही सजा ए इन्तजार  दोगे !


खता  हो गयी मुझसे की जो तुझको अपनी जान तेरे नाम किया  ,
बेवफा हमें क्या पता  था  तुम्ही कातिले ए जान निकलोगे !


"गौरव दुबे "

Monday, 1 September 2014

तुम देना साथ मेरा

कुछ क्षण आते हैं ज़िंदगी में जब लगता है कि इससे बुरा और कुछ नहीं हो सकता। कुछ समय बाद कुछ उससे भी बुरा दिखता है तो लगता है पहले हम कितने गलत थे। जो हुआ वह इतना भी गलत नहीं था। जितना था वह झेला जा सकता था। काश! सबकी ज़िंदगी में कुछ ऐसे रिश्ते होते जो उस बुरे क्षण के बीत जाने तक हमारा साथ देते। ऐसा होता तो लोग बेघर न होते, आत्महत्या न करते। आज सब अपने में इतने मस्त हैं कि उन्हें लगता ही नहीं कि उन्हें भी किसी की ज़रूरत पड़ सकती है। स्वार्थ में इंसान को दूसरा दिखाई ही नहीं देता। ऐसे ही लोग आत्महत्या करने के कगार पर पहुँच जाते हैं।
लोगों के साथ उनके दुख के क्षणों में खड़े हों, ताकि आपके दुख में लोग आपके साथ आयें। साथ का मतलब कुछ करना ही नहीं होता। कई बार केवल बातों से या केवल साथ खड़े होकर ही आप किसी को जीवन दे सकते हैं।